INTERNATIONAL JOURNAL OF ACADEMIC EXCELLENCE AND RESEARCH (IJAER) e-ISSN: 3107-3913 ( Vol. 01 | No. 4 | October - December, 2025 )

भारत में मानवाधिकारों से संबंधित क्रियान्वयन अभिकरण

Author: डॉ. रमेशी मीना (Dr. Rameshi Meena)

प्रकृति के द्वारा मनुष्य को विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं,, लेकिन इन शक्तियों का स्वयं अपने और समाज के हित में उचित रूप से प्रयोग करने के लिए कुछ बाहरी सुविधाओं की आवश्यकता होती है राज्य का सर्वाेच्च लक्ष्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास है इस प्रकार राज्य के द्वारा व्यक्ति को ये सुविधाएं प्रदान की जाती हैं और राज्य के द्वारा व्यक्ति को प्रदान की जाने बाली इन बाहरी सुविधाओं का नाम ही ‘अधिकारहै।,मानव अधिकार वे अधिकार है जो हमारी प्रकृति या स्वभाव में निहित हैं। इनके अभाव में हम मानव के रूप में अपना जीवन व्यतीत नहीं कर सकते हैं। मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रताएँ हमकों पूर्णरूप से विकसित होने के लिये अवसर प्रदान करती हैं। साथ ही इनके द्वारा मानवीय गुणों, प्रतिभाओं तथा चेतना का सदुपयोग किया जाता है। यह अधिकार मानवता पर आधारित है। मानवाधिकारों की सर्जना नहीं की जाती है वरन् इनकी स्थिति स्वाभाविक होती है। मानवाधिकार सभी मनुष्यों के अंतर्निहित अधिकार हैं, चाहे उनकी जाति, लिंग, राष्ट्रीयता, जातीयता, भाषा, धर्म या कोई अन्य स्थिति कुछ भी हो। मानवाधिकारों में जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार, गुलामी और यातना से मुक्ति, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, काम और शिक्षा का अधिकार, और भी बहुत कुछ शामिल है। बिना किसी भेदभाव के, सभी को ये अधिकार प्राप्त हैं। भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए मुख्य अभिकरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग हैं, जिन्हें मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित किया गया है। ये संस्थाएं शिकायतें दर्ज करने और जांच करने का काम करती हैं हालांकि उनके पास दंडात्मक अधिकार नहीं हैं इनके अलावा, विभिन्न न्यायालय, विभिन्न सरकारी आयोग और गैर-सरकारी संगठन (छळव्) भी मानवाधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए काम करते हैं। प्रकृति, व्यक्तित्व, स्वतंत्रताएं, मानवाधिकार, राष्ट्रीयता, अधिनियम, दंडात्मक, सुरक्षा, संवर्धन।

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