प्रस्तुत शोध-पत्र “हिंदी भाषा का ऐतिहासिक विकासः एक समग्र अ/ययन” का उद्देश्य हिंदी भाषा की उत्पत्ति, विकास-यात्रा और उसके वर्तमान स्वरूप का ऐतिहासिक एवं भाषावैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण करना है। हिंदी भाषा भारतीय आर्य भाषाओं की परंपरा से विकसित हुई एक समृद्ध एवं जीवंत भाषा है, जिसकी जड़ें संस्कृत में निहित हैं। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से आधुनिक हिंदी तक की विकास-प्रक्रिया ने हिंदी को एक व्यापक और सशक्त भाषा का रूप प्रदान किया है। इस अ/ययन में हिंदी भाषा के विकास को विभिन्न कालखंडोंकृप्राचीन, म/यकालीन और आधुनिककृके संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। प्राचीन काल में सिद्ध और नाथ साहित्य के मा/यम से हिंदी के प्रारंभिक स्वरूप का विकास हुआ, जबकि म/यकाल में भक्तिकाल और रीतिकाल ने हिंदी को जनभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। कबीर, तुलसीदास, सूरदास और जायसी जैसे कवियों ने लोकभाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान कर हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आधुनिक काल में खड़ी बोली के विकास के साथ हिंदी गद्य का उत्कर्ष हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रयासों से हिंदी भाषा को मानक स्वरूप प्राप्त हुआ तथा पत्रकारिता, निबंध, कहानी और उपन्यास जैसी विधाओं का विकास संभव हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति का प्रमुख मा/यम बनी और स्वतंत्र भारत में इसे राजभाषा का संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। वर्तमान डिजिटल और वैश्वीकरण के युग में हिंदी भाषा निरंतर नए रूपों में विकसित हो रही है। तकनीक, मीडिया और शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी की बढ़ती भूमिका इसके उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है। यह अ/ययन निष्कर्ष रूप में स्थापित करता है कि हिंदी भाषा का ऐतिहासिक विकास केवल भाषिक परिवर्तन की कथा नहीं है, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और चेतना के विकास का प्रतिबिंब भी है।