इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति में आर्थिक नीतियों और भू-राजनीतिक रणनीतियों के बीच की पारंपरिक सीमाएँ तेजी से धुंधली होती जा रही हैं। वैश्वीकरण के प्रारंभिक चरण में जहाँ व्यापार को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और पारस्परिक निर्भरता का माध्यम माना जाता था, वहीं वर्तमान दौर में व्यापार नीतियाँ शक्ति-संतुलन, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के प्रमुख उपकरण बन चुकी हैं। विशेष रूप से टैरिफ नीति अब केवल आर्थिक संरक्षण का साधन न होकर राज्यों की विदेश नीति और रणनीतिक सोच का अभिन्न अंग बन गई है। इसी व्यापक संदर्भ में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। यह क्षेत्र न केवल वैश्विक उत्पादन, आपूर्ति-श्रृंखला और समुद्री व्यापार मार्गों का केंद्र है, बल्कि अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का मुख्य मंच भी बन चुका है। विश्व व्यापार के एक बड़े हिस्से का प्रवाह इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिससे यहाँ की आर्थिक नीतियाँ वैश्विक स्तर पर गहरे प्रभाव उत्पन्न करती हैं। इस पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा वर्ष 2025 में अपनाई गई टैरिफ नीति को केवल घरेलू आर्थिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा सकता। 2025 की अमेरिकी टैरिफ नीति उस समय लागू की गई जब वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाएँ पुनर्गठन के दौर से गुजर रही थीं और रणनीतिक उद्योगों पर नियंत्रण को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जाने लगा था। अमेरिका ने इस नीति के माध्यम से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित करने के साथ-साथ क्षेत्रीय देशों के रणनीतिक आचरण को भी प्रभावित करने का प्रयास किया। यही कारण है कि यह नीति व्यापार और भू-राजनीति के अंतर्संबंध को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन-विषय बन जाती है। इस पृष्ठभूमि में प्रस्तुत शोध-पत्र 2025 की अमेरिकी टैरिफ नीति को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की भू-राजनीति के संदर्भ में विश्लेषित करता है और यह स्पष्ट करने का प्रयास करता है कि किस प्रकार आर्थिक उपकरणों का उपयोग कर वैश्विक शक्ति-संतुलन को पुनर्परिभाषित किया जा रहा है। शब्दकोशः वैश्विक राजनीति, व्यापार नीतियाँ, टैरिफ नीति-2025, भू-राजनीति।